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गरबा-डांडिया की धूम और कंडोम की बढ़ती डिमांड! नवरात्रि में सेक्स पर चर्चा क्यों तेज ?

 

नवरात्रि का पर्व…भक्ति, आस्था, उत्साह और गरबा-डांडिया की खनक का पर्व इन नौ दिनों में शहरों से लेकर कस्बों तक उत्सव का माहौल दिखाई देता है। युवा बड़ी संख्या में आयोजनों में शामिल होते हैं, नए लोगों से मिलते हैं और सामाजिक मेलजोल बढ़ता है।

 

लेकिन इस उत्सवी माहौल के बीच एक ऐसा विषय भी है, जिस पर भारतीय समाज में आज भी खुलकर बात करने से परहेज किया जाता है। वह विषय है—सेक्स, सुरक्षित यौन संबंध और यौन स्वास्थ्य।

 

दावा किया जाता रहा है कि नवरात्रि के दौरान गुजरात और पश्चिमी भारत के कुछ बाजारों में कंडोम की बिक्री में 25 से 50 प्रतिशत तक मौसमी बढ़ोतरी होती है। हालांकि, इस आंकड़े की पुष्टि के लिए व्यापक और विश्वसनीय बिक्री आंकड़े जरूरी हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या यह बढ़ोतरी वास्तव में नवरात्रि से जुड़ी है, या त्योहारों, छुट्टियों और शादी के सीजन के संयुक्त प्रभाव का नतीजा है ?

गरबा और डांडिया जैसे आयोजन युवाओं को एक-दूसरे से मिलने, बातचीत करने और सामाजिक संबंध बनाने का अवसर देते हैं। लेकिन किसी त्योहार में युवाओं की भागीदारी को सीधे यौन गतिविधियों या कंडोम की बढ़ती मांग से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

इसके बावजूद, यह चर्चा एक जरूरी सामाजिक सवाल जरूर खड़ा करती है—क्या हमारा समाज युवाओं को यौन स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी देता है ? क्या सुरक्षित यौन संबंध, गर्भनिरोधक उपाय और आपसी सहमति जैसे विषयों पर परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज में पर्याप्त संवाद होता है ?

सेक्स पर चुप्पी, जोखिम पर बात क्यों नहीं ?

भारत में सेक्स आज भी कई परिवारों में ऐसा विषय है, जिस पर बातचीत करना असहज माना जाता है। कई युवा सही जानकारी के अभाव में दोस्तों, सोशल मीडिया या अपुष्ट स्रोतों पर निर्भर हो जाते हैं।

यही चुप्पी कई बार अनचाहे गर्भ, यौन संक्रमण और गलत धारणाओं का कारण बन सकती है। जरूरत सेक्स को सनसनी या शर्म का विषय बनाने की नहीं, बल्कि इसे जिम्मेदारी, स्वास्थ्य और जागरूकता के नजरिये से समझने की है।

 

कंडोम की बिक्री से बड़ा सवाल—सुरक्षा और जिम्मेदारी

कंडोम केवल गर्भनिरोध का साधन नहीं है, बल्कि इसका सही और नियमित इस्तेमाल कई यौन संक्रमणों, जिनमें एचआईवी भी शामिल है, के जोखिम को कम करने में मदद करता है।

हालांकि, इसका इस्तेमाल जोखिम को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। सही जानकारी, हर बार उचित तरीके से इस्तेमाल और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह भी महत्वपूर्ण हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी यौन संबंध में दोनों व्यक्तियों की स्पष्ट और स्वैच्छिक सहमति होनी चाहिए। त्योहार का माहौल, दोस्ती, आकर्षण या किसी के साथ समय बिताना सहमति का विकल्प नहीं है।

कंपनियों के लिए बाजार, समाज के लिए जागरूकता..

कंडोम कंपनियां त्योहारों और छुट्टियों के मौसम में अपने उत्पादों की उपलब्धता, प्रचार और वितरण पर ध्यान देती हैं। लेकिन बिक्री बढ़ने के दावों और वास्तविक उपभोक्ता व्यवहार के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।

सिर्फ बिक्री के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी त्योहार के दौरान यौन गतिविधियां कितनी बढ़ीं। इसके लिए विश्वसनीय बाजार आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होती है।

दूसरी ओर, यदि त्योहारों के दौरान सुरक्षित यौन संबंधों पर चर्चा बढ़ती है, तो इसे जागरूकता का अवसर बनाया जा सकता है—बशर्ते संदेश जिम्मेदार, तथ्यपरक और किसी समुदाय या संस्कृति को बदनाम करने वाला न हो।

 

नवरात्रि आस्था और उत्सव का पर्व है। गरबा हो या डांडिया, खुशी मनाना और सामाजिक मेलजोल बढ़ाना जीवन का हिस्सा है। लेकिन उत्सव के बीच स्वास्थ्य और जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

सेक्स कोई ऐसा विषय नहीं, जिस पर बात करने मात्र से समाज की संस्कृति खतरे में पड़ जाए। असल चुनौती है—बिना शर्मिंदगी, बिना भ्रामक दावों और बिना किसी दबाव के सही जानकारी उपलब्ध कराना।

क्योंकि जागरूकता का अर्थ सेक्स को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सुरक्षित व्यवहार, आपसी सहमति और जिम्मेदार फैसलों को बढ़ावा देना है।

 

क्या हम अगली पीढ़ी को सेक्स पर चुप रहना सिखाएंगे, या सही जानकारी के साथ जिम्मेदार बनना?