₹16 करोड़ का पुल, 16 दिन में धंसी अप्रोच रोड! क्या सिर्फ डिजाइनर बनेगा बलि का बकरा ?
देहरादून: हरबर्टपुर राष्ट्रीय राजमार्ग-72 पर टौंस नदी के ऊपर लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित नंदा की चौकी पुल के उद्घाटन के महज 16 दिन बाद अप्रोच रोड धंसने की घटना ने निर्माण कार्य, गुणवत्ता नियंत्रण और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच, सोशल मीडिया पर टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बाद लोक निर्माण विभाग (PWD) ने विस्तृत प्रेस नोट जारी कर निविदा प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप बताया है। वहीं, मीडिया रिपोर्टों में प्रारंभिक जांच में डिजाइन संबंधी कमियों का उल्लेख किए जाने के बाद यह बहस तेज हो गई है कि यदि कार्रवाई केवल डिजाइन कंसल्टेंट तक सीमित रहती है, तो क्या अन्य जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय होगी।
क्या केवल डिजाइन ही जिम्मेदार है?
किसी भी पुल परियोजना में केवल डिजाइन तैयार करना अंतिम चरण नहीं होता। डिजाइन की तकनीकी समीक्षा और स्वीकृति, डीपीआर (DPR), जनरल अरेंजमेंट ड्रॉइंग (GAD) तथा निर्माण ड्रॉइंग का परीक्षण, साइट की भौगोलिक एवं भू-तकनीकी परिस्थितियों का आकलन, निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री की जांच, चरणबद्ध निरीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण, मेजरमेंट बुक (MB) का सत्यापन, रनिंग एवं फाइनल बिल का प्रमाणीकरण तथा कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी करने तक अनेक स्तरों पर सरकारी अभियंता और अधिकारी अपनी तकनीकी एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते हैं।
ऐसे में यदि जांच में वास्तव में डिजाइन संबंधी गंभीर कमी सामने आती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि संबंधित अधिकारियों ने डिजाइन और तकनीकी दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार किया। यदि परीक्षण हुआ था, तो उस समय कोई आपत्ति क्यों दर्ज नहीं की गई? और यदि परीक्षण नहीं हुआ, तो क्या यह स्वयं प्रशासनिक लापरवाही नहीं मानी जाएगी?
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निर्माण गुणवत्ता पर भी उठ रहे सवाल
यदि जांच में यह निष्कर्ष निकलता है कि पुल की मुख्य संरचना, फाउंडेशन और एबटमेंट सुरक्षित हैं तथा केवल अप्रोच रोड क्षतिग्रस्त हुई है, तो तकनीकी दृष्टि से निर्माण गुणवत्ता की भी विस्तृत जांच आवश्यक होगी। इसमें अर्थ फिलिंग (Earth Filling), कंपैक्शन, ड्रेनेज व्यवस्था, रिटेनिंग स्ट्रक्चर, ट्रांजिशन ज़ोन तथा गुणवत्ता नियंत्रण की स्थिति का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जाएगा।
इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि निर्माण के दौरान किए गए Compaction Test, Field Density Test (FDT), Soil Investigation, Quality Control Reports, Third Party Inspection, Site Order Book तथा निरीक्षण रजिस्टर निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार किए गए थे या नहीं।
यदि सभी परीक्षण संतोषजनक थे, तो उद्घाटन के कुछ दिनों बाद अप्रोच रोड धंसने जैसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? और यदि परीक्षण या निरीक्षण में कमी थी, तो करोड़ों रुपये के सार्वजनिक भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किए गए?

पूरी निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि जांच केवल डिजाइन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरी Decision Chain की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। इसमें डीपीआर तैयार करने वाली एजेंसी, डिजाइन कंसल्टेंट, निर्माण एजेंसी, सुपरविजन कंसल्टेंट, गुणवत्ता नियंत्रण इकाई, संबंधित अभियंता, निरीक्षण करने वाले अधिकारी तथा भुगतान स्वीकृत करने वाले सक्षम अधिकारियों की भूमिका का भी वस्तुनिष्ठ परीक्षण होना चाहिए।
अंततः वास्तविक जिम्मेदारी तकनीकी साक्ष्यों और आधिकारिक जांच रिपोर्ट के आधार पर ही तय होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर डिजाइन, निर्माण, पर्यवेक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण या प्रशासनिक निर्णय में चूक पाई जाती है, तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में सभी जिम्मेदार पक्षों पर होनी चाहिए।

PWD ने टेंडर प्रक्रिया को बताया पारदर्शी
इस बीच लोक निर्माण विभाग ने सोशल मीडिया पर टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा है कि पुल के पुनर्निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण के लिए अपनाई गई पूरी निविदा प्रक्रिया उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली-2025 के अनुरूप और पूरी तरह पारदर्शी रही।
विभाग के अनुसार पहली निविदा 14 नवंबर 2025 को जारी की गई थी, लेकिन तकनीकी मूल्यांकन के बाद केवल एक पात्र बोलीदाता बचने के कारण नियमों के तहत इसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद 3 जनवरी 2026 को दोबारा ई-टेंडर जारी किया गया। दूसरी निविदा में भी दो फर्मों ने भाग लिया और तकनीकी परीक्षण के बाद एक फर्म के पात्र पाए जाने पर नियमानुसार 31 जनवरी 2026 को कार्यादेश जारी किया गया।

PWD ने बताया कि पुल का निर्माण पूरा होने के बाद इसे 12 जुलाई 2026 को यातायात के लिए खोल दिया गया था। हालांकि 28 जुलाई 2026 को पुल की दाहिनी ओर स्थित अप्रोच रोड का हिस्सा मिट्टी खिसकने के कारण क्षतिग्रस्त हो गया। विभाग के अनुसार मामले की जांच मुख्य अभियंता, क्षेत्रीय कार्यालय, देहरादून द्वारा की जा रही है और अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएंगे।
जवाबदेही पर जनता की नजर
यह मामला अब केवल एक पुल या एक डिजाइनर तक सीमित नहीं रह गया है। यह सार्वजनिक धन, इंजीनियरिंग मानकों, निर्माण गुणवत्ता और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन जनहित में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही सिद्ध होती है तो कार्रवाई सभी जिम्मेदार पक्षों पर समान रूप से हो, ताकि भविष्य में सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
