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उत्तराखंड में भू-कानून को लेकर गरमाया मुद्दा, 144 नाली भूमि की खरीद पर उठे सवाल

देहरादून, 11 अगस्त 2026।

उत्तराखंड में भू-कानून, पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की खरीद-फरोख्त और कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग को लेकर अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने गंभीर सवाल उठाए हैं। देहरादून में आयोजित पत्रकार वार्ता में संगठनों ने आरोप लगाया कि भूमि कानूनों के प्रावधानों का कथित दुरुपयोग कर पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि खरीद और प्लॉटिंग की जा रही है। संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की।

एराड़ी गांव में 144 नाली जमीन का मामला

पत्रकार वार्ता में पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा करीब 144 नाली भूमि की खरीद का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। वक्ताओं का आरोप है कि भूमि खरीद के दौरान दस्तावेजों में इसका प्रयोजन कृषि कार्य बताया गया, जबकि बाद में भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर बिक्री किए जाने की प्रक्रिया की जा रही है।

 

संगठनों ने भूमि की खरीद से लेकर वर्तमान उपयोग तक के राजस्व अभिलेख, रजिस्ट्री दस्तावेज, भूमि उपयोग, स्वीकृतियां और भूखंडों की बिक्री की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की।

कंपनी के पुराने होने के दावे पर भी सवाल

वक्ताओं ने संबंधित कंपनी के गठन और पुरानी संपत्तियों को लेकर किए जा रहे दावों की भी जांच की मांग की। उनका कहना है कि कंपनी की स्थापना, पूर्व निदेशकों, वर्तमान निदेशक मंडल, शेयरहोल्डिंग और वर्ष 2003 से पूर्व की संपत्तियों के बीच वास्तविक कानूनी एवं स्वामित्व संबंधों की जांच जरूरी है।

संगठनों ने सरकार से कंपनी की उत्तराखंड में वास्तविक गतिविधियों और भूमि खरीद के घोषित उद्देश्य की भी पड़ताल कराने की मांग की।

कंपनी के पुराने होने के दावे पर भी सवाल

 

वक्ताओं ने संबंधित कंपनी के गठन और पुरानी संपत्तियों को लेकर किए जा रहे दावों की भी जांच की मांग की। उनका कहना है कि कंपनी की स्थापना, पूर्व निदेशकों, वर्तमान निदेशक मंडल, शेयरहोल्डिंग और वर्ष 2003 से पूर्व की संपत्तियों के बीच वास्तविक कानूनी एवं स्वामित्व संबंधों की जांच जरूरी है।

संगठनों ने सरकार से कंपनी की उत्तराखंड में वास्तविक गतिविधियों और भूमि खरीद के घोषित उद्देश्य की भी पड़ताल कराने की मांग की।

 

पुरानी कंपनियों के जरिए भू-कानून दरकिनार करने का आरोप

 

अधिवक्ता सेवा मंच ने आरोप लगाया कि पुरानी कंपनियों के माध्यम से भूमि खरीद से संबंधित निर्धारित शर्तों को दरकिनार किए जाने की आशंका है। संगठन ने वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई कंपनियों द्वारा उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार विशेष ऑडिट कराने की मांग की।

 

धारा 154 की समीक्षा की मांग

 

वक्ताओं ने भू-कानून में किए गए संशोधनों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की मांग की। उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए भूमि खरीद एवं उसके व्यावसायिक उपयोग पर स्पष्ट और प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।

 

लैंसडौन और यमकेश्वर में भी जांच की मांग

 

पत्रकार वार्ता में लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्र में भूमि खरीद, प्लॉटिंग, रिसॉर्ट, आश्रम, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्र जैसी गतिविधियों का मुद्दा भी उठाया गया। संगठनों ने राजस्व, वन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम बनाकर विशेष जांच अभियान चलाने की मांग की।

 

कैटल गांव में पेड़ कटान और वन क्षेत्र से रास्ते पर सवाल

 

कैटल गांव में कथित पेड़ कटान के बाद आश्रम निर्माण और निर्माण स्थल तक पहुंचने वाले रास्ते को लेकर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि यदि मार्ग आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजरता है तो वन विभाग की अनुमति, भूमि की स्थिति और मार्ग निर्माण की वैधता की जांच होनी चाहिए।

 

भूजल दोहन पर भी जताई चिंता

 

आश्रमों, होटल, रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों में कथित बोरिंग और भूजल दोहन को लेकर भी संगठनों ने चिंता जताई। उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत बेहद संवेदनशील हैं और अनियंत्रित भूजल दोहन का सीधा असर स्थानीय ग्रामीणों पर पड़ सकता है।

 

संगठनों ने ऐसे सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग और संबंधित अनुमतियों का वैज्ञानिक एवं विभागीय ऑडिट कराने की मांग की।

 

कृषि भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियों की जांच हो

 

वक्ताओं ने कहा कि यदि किसी भूमि को कृषि प्रयोजन के लिए खरीदा गया है तो बाद में उस पर संचालित होने वाली व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता की जांच आवश्यक है। उन्होंने भूमि उपयोग परिवर्तन, नक्शा स्वीकृति, निर्माण अनुमति, पर्यटन विभाग की अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति और जल उपयोग समेत सभी जरूरी अनुमतियों की जांच की मांग की।

 

राजस्व विभाग की भूमिका की भी जांच की मांग

 

संगठनों ने कहा कि यदि भूमि खरीद या उसके उपयोग में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो सिर्फ खरीदार ही नहीं, बल्कि संबंधित राजस्व अभिलेखों और स्वीकृतियों की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

 

सरकार के सामने रखीं प्रमुख मांगें

 

अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने सरकार से—

 

एराड़ी गांव की 144 नाली भूमि की खरीद और कथित प्लॉटिंग की उच्चस्तरीय जांच।

संबंधित कंपनी के गठन, निदेशकों और शेयरहोल्डिंग की जांच।

वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई कंपनियों द्वारा खरीदी गई भूमि का जनपदवार ऑडिट।

भूमि खरीद के समय घोषित प्रयोजन और वर्तमान उपयोग का मिलान।

कृषि भूमि पर संचालित व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता की जांच।

धारा 154 समेत वर्तमान भू-कानून की व्यापक समीक्षा।

बाहरी कंपनियों द्वारा खरीदी गई भूमि के वास्तविक उपयोग की निगरानी के लिए विशेष व्यवस्था।

लैंसडौन और यमकेश्वर में भूमि खरीद एवं व्यावसायिक गतिविधियों की विशेष जांच।

आरक्षित वन क्षेत्रों में बने रास्तों और निर्माण की जांच।

बड़े आश्रमों, होटल, रिसॉर्ट और वेलनेस सेंटरों में बोरिंग एवं भूजल दोहन की जांच की मांग की।

वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जल, जंगल और जमीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। इसलिए सरकार को आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखते हुए संबंधित दस्तावेजों की जांच कर वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति, कंपनी या अधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

पत्रकार वार्ता में एडवोकेट संदीप चमोली, पंकज उनियाल, एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट और एडवोकेट प्रदीप पासवान मौजूद रहे।