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नकली दवाइयां के संदर्भ में ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ने कई सत्यापन युक्त बड़े खुलासे किए।

दिनांक 2 जुलाई को उत्तरांचल प्रेस में  ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के द्वारा पत्रकार वार्ता आयोजित किया गया।

जिसमें संगठन के अध्यक्ष ने पत्रकारों से बातचीत की , उन्होंने नकली और असली दवाई को लेकर कई बड़े दावे किए , उन्होंनेे कहा दवा उद्योग से जुड़ी कुछ गंभीर, तथ्यों पर आधारित और बेहद ज़रूरी बातों को रखने आया हूँ, जिन पर आज चर्चा होना बहुत आवश्यक है।

Health Min. calls for report on medicinal drugs required for 6 months

 

ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने प्रदेश तेजी से फार्मा हब बनने की दिशा में बढ़ रहा है। प्रदेश में फार्मा कंपनियों का विस्तार हो रहा है और यहां से निर्मित दवाएं विश्व के अनेक देशों में निर्यात की जा रही है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के फार्मा हब बनने की दिशा में कुछ बाहरी प्रदेशों के लोग अडंगा लगाने का प्रयास कर रहे हैं और यहां की कंपनियों के नाम पर नकली दवाएं बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे नकली दवा निर्माताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। एसोसिएशन के मुताबिक नकली दवाओं और नॉन स्टैंडर्ड क्वालिटी (एनएसक्यू) ड्रग में अंतर होता है। एनएसक्यू दवाएं नकली नहीं होती है उनमें महज तकनीकी कमी होती है। देहरादून स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब में मीडिया से बात करते हुए ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद कालानी ने बताया कि प्रदेश में पूर्ण रूप से गुणवत्तापूर्ण दवाओं का निर्माण हो रहा है। फार्मा कंपनियां दवा उत्पादन के सभी निर्धारित मापदंडों का पालन कर रही है। उनके मुताबिक अच्छी दवाएं तय मानकों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुसार बनाई जाती हैं। वहीं नकली दवाएं या तो घटिया सामग्री से बनती हैं, या उनकी जानकारी और लेबलिंग जानबूझकर गलत दी जाती है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद कालानी ने बताया कि हर एनएसक्यू दवा नकली नहीं होती। उन्होंने कहा कि कोई भी लाइसेंस प्राप्त मैन्युफैक्चरर नकली दवाएं नहीं बनाता। उन्होंने कहा कि मीडिया एनएसक्यू में फेल दवा को नकली बताता है जो कि सही नहीं है। यह तकनीकी कमियों का मामला है। ऐसे में यदि मीडिया इस दवा को नकली बताए तो कंपनी और उसकी ब्रांडिंग पर प्रतिकूल असर पड़ता है। एसोसिएशन के सदस्य पीके बंसल ने बताया कि अधिकांश दवाएं पीएच में अंतर होने, डिसइंटीग्रेशन टेस्ट में विलंब, डिसॉलूशन टेस्ट में बदलाव या लेबलिंग की गलती से होती है। यह दवा किसी भी तरह से मरीज के लिए हानिकारक नहीं होती है। बस इसमें तकनीकी कमी होती है।

एसोसिएशन के महासचिव संजय सिकारिया के मुताबिक हाल में जिन दवाओं के 27 सैंपल फेल होने की बात है। वह भी इन मामूली तकनीक के आधार पर ही फेल किये गये हैं। हमें 28 दिन में हायर टेस्टिंग लैब में इसकी जांच करने की अपील करनी होती है। मुख्य टेस्टिंग लैब कोलकत्ता में है। यदि वहां से भी सैंपल फेल होता है तो ही दवा को सब स्टैंडर्ड या नकली बताया जा सकता है। एसोसिएशन के सदस्य रमेश जैन के मुताबिक क्लाइमेट चेंज का असर भी दवाओं पर होता है। उनके मुताबिक कश्मीर में अलग मौसम होता है और तटीय इलाकों में दूसरा तो नार्थ-ईस्ट में अलग। दवा एक ही होती है। कैमिस्ट यदि इसे धूप में रखेगा तो इसकी गुणवत्ता प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि दवाओं को ठंडी जगह और अंधेरे में रखने की सलाह दी जाती है लेकिन सभी कैमिस्ट इसका पालन नहीं करते।

एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद कालानी ने मीडिया से अपील की कि एनएसक्यू दवाओं को नकली न कहा जाए। उन्होंने कहा कि मीडिया महज सेंटर ड्रग्स स्टेंडर्ड कंट्रोल आर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) की प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर ही दवाओं को नकली बताकर समाचार प्रकाशित या चैनल पर दिखा देते हैं इससे कंपनी की छवि और ब्रांड पर प्रतिकूल असर पड़ता है। जबकि मीडिया से यह उम्मीद की जाती है कि कोलकत्ता स्थिति सेंट्रल लेबोरिटी (सीडीएल ) से जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही सही समाचार प्रकाशित किया जाएं। फार्मा कंपनी की दवाओं को एनएसक्यू के आधार पर नकली न करार दिया जाए। इससे कंपनी की ब्रांड और छवि खराब होती है।

 

 

1. अच्छी गुणवत्ता और नकली दवाओं में अंतर..

 

हमें सबसे पहले यह स्पष्ट करना होगा कि “अच्छी गुणवत्ता की दवाएं” और “नकली या डुप्लिकेट दवाएं” दो बिल्कुल अलग चीजें हैं।

अच्छी दवाएं तय मानकों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुसार बनाई जाती हैं। वहीं नकली दवाएं या तो घटिया सामग्री से बनती हैं, या उनकी जानकारी/लेबलिंग जानबूझकर गलत दी जाती है।

नकली दवा बनाना अपराध है। लेकिन हर NSQ दवा नकली नहीं होती — यह समझना ज़रूरी है।

 

2. कोई भी लाइसेंस प्राप्त मैन्युफैक्चरर नकली दवाएं नहीं बनाता

 

जिन फर्मों को राज्य अथवा केंद्र से विधिवत मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस मिला है, वे प्रक्रिया, नियम और गुणवत्ता नियंत्रण का पालन करते हैं।

इनका उद्देश्य कभी भी नकली दवा बनाना नहीं होता। लेकिन अफ़सोस, मीडिया में हर “फेल” दवा को “नकली” बताकर ब्रांड और निर्माता की छवि को नुकसान पहुंचाया जाता है।

3. दवाएं फेल क्यों होती हैं – तकनीकी कारणों से

ज्यादातर दवाएं माइनर टेक्निकल कारणों से फेल होती हैं, जैसे:

 • pH में थोड़ा अंतर,

 • डिसइंटीग्रेशन टेस्ट में विलंब,

 • डिसॉलूशन टेस्ट में बदलाव,

 • या लेबलिंग की गलती।

 

हर NSQ रिपोर्ट यह नहीं कहती कि दवा पूरी तरह बेअसर या खतरनाक है।

प्रत्येक दवा Assay (API की मात्रा) में फेल नहीं होती। यह फर्क समझना बहुत ज़रूरी है।

 

4. न्यूज़ छापने की प्रक्रिया- 

 

आजकल देखा जा रहा है कि CDSCO के प्राथमिक अलर्ट के आधार पर अखबारों में खबरें प्रकाशित कर दी जाती हैं।

जबकि Drugs & Cosmetics Act की धारा 25(3) के अनुसार, निर्माता फर्म को CDL (Central Drug Laboratory) में पुनः परीक्षण का अधिकार है।

जब तक CDL से फाइनल रिपोर्ट नहीं आ जाती और वही NSQ न निकले, तब तक किसी भी प्रकार की सार्वजनिक रिपोर्टिंग नहीं की जानी चाहिए।

 

5. फेल सैंपल्स का डेटा तो आता है, पास हुए सैंपल्स का क्या?

 

जब कोई सैंपल फेल होता है, तो उसका पूरा विवरण – बैच, निर्माता, तारीख – सब प्रकाशित हो जाता है।

लेकिन जब वही सैंपल सेक्शन 25(3) के तहत CDL में चैलेंज होने पर पास हो जाता है, तब उसकी कोई सूचना सार्वजनिक नहीं की जाती।

यह एकतरफा प्रक्रिया है, जो निर्माता की साख को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।

 

6. DGCI की गाइडलाइन्स और STP का पालन नहीं हो रहा

 

DGCI द्वारा जारी की गई सामान्य दिशानिर्देशों (General Guidelines) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि,

जब भी कोई संयोजन औषधि (Combination Drug) बनाई जाती है, तो उसकी Standard Testing Procedure (STP) निर्माता फर्म से ही ली जानी चाहिए।

लेकिन दुर्भाग्यवश, कई मामलों में ये STP फॉलो ही नहीं की जाती, जिससे गलत परिणाम निकलते हैं और NSQ घोषित कर दिया जाता है।

7. उत्तराखंड की प्रतिष्ठा का दुरुपयोग

 

आज उत्तराखंड को भारत में गुणवत्तायुक्त औषधि निर्माण केंद्र के रूप में पहचाना जाता है।

लेकिन कुछ बाहरी राज्यों के लोग उत्तराखंड के पते पर दवाएं बना रहे हैं – जबकि उनके बताए पते पर कोई फैक्ट्री मौजूद ही नहीं होती।

इससे न केवल नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि प्रदेश की छवि धूमिल हो रही है।

सच बोलने वाले निर्माता नुकसान उठा रहे हैं, और सिस्टम की चूक का फायदा उठाने वाले बच निकलते हैं।

 

मित्रों, दवा निर्माण सिर्फ उद्योग नहीं, एक सामाजिक जिम्मेदारी है।

हमें यह सुनिश्चित करना है कि

 • सच को पहचाना जाए,

 • झूठ को रोका जाए,

 • और जो सिस्टम पारदर्शिता से पीछे हटता है, उसे सुधारा जाए।

 

हम सबका दायित्व है कि फार्मा इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा और ईमानदारी को सुरक्षित रखें।

 

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में फार्मा कंपनी के कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। जिसमें प्रमोद कालानी, पी एस चावला संजय सिंघारिया पी के बंसल निखिल गोयल आर सी जैन कुलदीप सिंह आदि थे।

 

 

 

 

 

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