सरकार ने लागू किया एस्मा, उत्तराखंड में छह महीने तक हड़ताल पर रोक
उत्तराखंड में राज्य कर्मचारियों और विभागों के अंतर्गत काम करने वाले कर्मियों के लिए आदेश जारी किया गया है. दरअसल, शासन ने कर्मचारियों की हड़ताल पर रोक के आदेश किए हैं. जिसके बाद अब प्रदेश में कर्मचारी अगले 6 महीनों तक हड़ताल नहीं कर पाएंगे.

ESMA का मतलब Essential Services Maintenance Act है, जिसे हिंदी में आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम कहा जाता है। यह एक ऐसा कानून है जो सरकार को आवश्यक सेवाओं में कर्मचारियों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने की अनुमति देता है, ताकि इन सेवाओं को बाधित होने से रोका जा सके और आम जनजीवन प्रभावित न हो। इस कानून के तहत, जो कर्मचारी हड़ताल करते हैं, उन्हें छह महीने तक की कैद या ₹250 का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
ESMA की मुख्य बातें:
उद्देश्य: देश के सामान्य कामकाज के लिए आवश्यक सेवाओं (जैसे सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं) की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना।
लागू करना: यह अधिनियम केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा लगाया जा सकता है। यह एक विशेष सेवा पर अधिकतम छह महीने के लिए लागू किया जा सकता है।
अधिसूचना: अधिनियम लागू करने से पहले, प्रभावित कर्मचारियों को आमतौर पर समाचार पत्रों या अन्य माध्यमों से सूचित किया जाता है।
दंड: अधिनियम का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है और उन्हें छह महीने तक की जेल या ₹250 का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
प्रासंगिकता: यह कानून संकट के समय में या जब आवश्यक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना हो, तो लागू किया जाता है।
उत्तराखंड सरकार ने राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को सुचारू रूप से संचालित रखने के उद्देश्य से एक बड़ा फैसला लेते हुए राज्य के अधीन सेवाओं में अगले छह महीने के लिए हड़ताल पर प्रतिबंध लागू कर दिया है. इस संबंध में सचिव कार्मिक शैलेश बगोली द्वारा बुधवार को अधिसूचना जारी की गई. जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यह आदेश तत्क्षण प्रभाव से लागू होगा.
अधिसूचना के अनुसार,
लोकहित में उ.प्र. अत्यावश्यक सेवाओं का अनुरक्षण अधिनियम, 1966 (उत्तराखंड राज्य में यथावत प्रवृत्त) की धारा 3(1) के अंतर्गत यह निर्णय लिया गया है. शासन का मानना है कि सरकारी तंत्र की निरंतरता और जनसेवा की बाधारहित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम आवश्यक है, क्योंकि हाल के दिनों में कई विभागों में हड़ताल एवं आंदोलन की स्थितियां बनी थीं, जिनसे सरकारी कार्य प्रभावित हो सकता था.

Uttarakhand DIPR
उत्तराखण्ड शासन ने राज्याधीन सेवाओं में हड़ताल पर अगले छह माह के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। आज कार्मिक सचिव शैलेश बगौली ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की।
जारी अधिसूचना के अनुसार, लोकहित को ध्यान में रखते हुए उ.प्र. अत्यावश्यक सेवाओं का अनुरक्षण अधिनियम, 1966 (जो उत्तराखण्ड राज्य में लागू है) की धारा 3(1) के तहत यह निर्णय लिया गया है। आदेश जारी होने की तारीख से आगामी छह महीनों तक राज्याधीन सेवाओं में किसी भी तरह की हड़ताल पूरी तरह निषिद्ध रहेगी।

सरकार का यह निर्णय उन सभी सेवाओं पर लागू होगा जो राज्याधीन मानी जाती हैं. इसी संदर्भ में अधिसूचना ने यह भी स्पष्ट संकेत दिया है कि उपनल के माध्यम से कार्यरत कार्मिक भी इस निर्णय के प्रभाव से बाहर नहीं हैं. राज्य के विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में संविदा एवं आउटसोर्सिंग कार्मिक उपनल के जरिए तैनात हैं. कई बार ये कर्मचारी भी अपनी मांगों को लेकर सामूहिक अवकाश या कार्य बहिष्कार की चेतावनी देते रहे हैं. शासन का यह निर्णय अब उपनल कर्मचारियों की संभावित हड़तालों या काम छोड़ो आंदोलनों पर भी प्रभावी रोक लगाएगा.
दरअसल, पिछले कुछ महीनों में स्वास्थ्य, ऊर्जा, परिवहन, निगमों एवं तकनीकी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा वेतनमान, सेवा सुरक्षा और नियमितीकरण जैसी मांगों को लेकर आंदोलन की परिस्थितियां उत्पन्न हुई थीं. सरकार ने इन्हें सार्वजनिक सेवाओं के लिए बाधक बताते हुए अत्यावश्यक सेवाओं को सुरक्षित रखने का आधार लिया है.
शासन का तर्क है कि प्रदेश में विकास योजनाओं, कुंभ 2027 की तैयारियों, डिजिटल प्रशासन और सार्वजनिक सेवा वितरण जैसे कई अहम मोर्चे चल रहे हैं. ऐसे में किसी भी प्रकार की हड़ताल से आम जनता को गंभीर परेशानी हो सकती है. इसलिए छह महीने की यह रोक एक तरह से प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करने का प्रयास है. सरकार द्वारा अधिनियम के तहत जारी यह प्रतिबंध अगले छह महीनों तक लागू रहेगा. इस अवधि में हड़ताल करने वालों पर कानूनी कार्रवाई भी संभव होगी.

