हरेला पर अनूप नौटियाल की चिंता: 25 वर्षों में उत्तराखंड में 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट, जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल की मांग
देहरादून। हरेला पर्व के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों के दौरान 46,203 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य में पर्यावरणीय रूप से जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई इस बात का संकेत है कि विकास परियोजनाओं का दबाव राज्य के संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार बढ़ रहा है।

नौटियाल ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत 16 जून 2026 को प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि राज्य गठन (नवंबर 2000) के बाद से विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि हरेला केवल पौधारोपण का पर्व नहीं, बल्कि जंगलों, नदियों, पर्वतों और प्राकृतिक संसाधनों के भविष्य पर गंभीर चिंतन का अवसर भी है।
RTI
उन्होंने बताया कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सड़क परियोजनाओं के लिए 10,070.03 हेक्टेयर, खनन के लिए 9,289.81 हेक्टेयर, ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 3,005.51 हेक्टेयर, विद्युत परियोजनाओं के लिए 2,250.08 हेक्टेयर तथा ‘अन्य’ श्रेणी में 20,837.63 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया गया है। उन्होंने कहा कि “अन्य” श्रेणी में इतनी बड़ी मात्रा में वन भूमि का उपयोग अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक जानकारी की मांग करता है।
जिला-वार आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कुल वन भूमि डायवर्जन का लगभग 47 प्रतिशत (21,618.32 हेक्टेयर) अकेले देहरादून जिले में हुआ है। इसके बाद हरिद्वार, नैनीताल, चमोली और टिहरी गढ़वाल का स्थान है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भविष्य में भी वन भूमि डायवर्जन का सबसे बड़ा बोझ देहरादून ही उठाता रहेगा, जबकि दून घाटी और शिवालिक क्षेत्र की वहन क्षमता सीमित है।
अनूप नौटियाल ने कहा कि उत्तराखंड पहले से ही अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि पर्यटन, चारधाम यात्रा और शहरी विकास के लिए वैज्ञानिक कैरिंग कैपेसिटी आधारित नियमन, आधारभूत परियोजनाओं में पर्यावरण एवं वन कानूनों का कड़ाई से पालन, बड़े प्रोजेक्ट्स का प्रभावी पर्यावरणीय आकलन, बेहतर क्षेत्रीय नियोजन, ईको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना तथा प्राकृतिक वनों और जैव विविधता के संरक्षण में अधिक निवेश सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि RTI के जवाब में प्रतिपूरक वनीकरण से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, जबकि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि वन भूमि के बदले कहां, कब और किस प्रकार पौधारोपण किया जाएगा तथा उसकी निगरानी कैसे होगी। उन्होंने कहा कि हिमालय के परिपक्व प्राकृतिक वनों की भरपाई केवल पौधारोपण से संभव नहीं है, इसलिए मौजूदा प्राकृतिक वनों का संरक्षण ही जलवायु परिवर्तन के दौर में उत्तराखंड की सबसे प्रभावी सुरक्षा रणनीति है।
अपने संदेश के अंत में अनूप नौटियाल ने प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए सामूहिक संकल्प लेने का आह्वान किया।
