ढोल-दमाऊ और मसकबीन की थाप पर निकली मां नंदा-सुनंदा की भव्य यात्रा, कदली वृक्ष लेकर मायके पहुंचीं महिलाएं
देहरादून, 15 सितंबर। उत्तराखंड की लोक आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े नंदा-सुनंदा महोत्सव का मंगलवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। कूर्मांचल परिषद गढ़ी शाखा की ओर से आयोजित कार्यक्रम के प्रथम दिन ब्लूमिंग बड्स, टपकेश्वर चौक गढ़ी कैंट से पारंपरिक परिधानों में सजी माताओं और बहनों के साथ श्रद्धालु ढोल-दमाऊ और मसकबीन की धुन पर झूमते हुए कदली वृक्ष लेकर सीता राम मंदिर, नींबूवाला-कौलागढ़ पहुंचे।
इस दौरान श्रद्धालुओं में मां नंदा-सुनंदा को बेटी के रूप में मायके लाने को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया। मान्यता के अनुसार मां नंदा-सुनंदा अगले नौ दिनों तक सीता राम मंदिर नींबूवाला-कौलागढ़ में विराजमान रहेंगी।
कार्यक्रम का शुभारंभ कैंट विधायक सविता कपूर ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पारंपरिक पीले वस्त्र पहनकर आयोजन में शामिल हुए।
राजा-रानी के स्वरूप में होगी मां नंदा-सुनंदा की स्थापना
कूर्मांचल परिषद गढ़ी शाखा की ओर से आयोजित इस महोत्सव में वरिष्ठ समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और उनकी धर्मपत्नी नंदी देवी को मां नंदा-सुनंदा के माता-पिता के स्वरूप में राजा-रानी की भूमिका प्रदान की गई है। वे विधि-विधान के साथ मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित करेंगे।
कार्यक्रम से जुड़ी वंदना बिष्ट ने बताया कि नंदा-सुनंदा की लोकपरंपरा में कदली वृक्ष यानी केले के पौधे का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। कदली के तने से मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है।
पवित्रता, समृद्धि और प्रकृति का प्रतीक है कदली वृक्ष
वंदना बिष्ट के अनुसार भारतीय धार्मिक परंपरा में केले के पौधे को शुभता, पवित्रता, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों में भी कदली वृक्ष का विशेष महत्व है।
नंदा देवी की लोकपरंपरा में प्रकृति को विशेष स्थान प्राप्त है। कदली वृक्ष से देवी का स्वरूप तैयार किया जाना देवी और प्रकृति के अटूट संबंध का प्रतीक माना जाता है। नंदा महोत्सव की विभिन्न स्थानीय परंपराओं में कदली वृक्ष का विधि-विधान से चयन, पूजन और उसके बाद देवी की प्रतिमाओं का निर्माण महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया है।
बेटी के मायके आने और विदाई का भाव
उत्तराखंड की लोकपरंपरा में मां नंदा को बेटी के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि नंदा-सुनंदा की पूजा और महोत्सव में बेटी के मायके आने, उसका स्वागत-सत्कार करने और बाद में विदाई देने की भावनाएं प्रमुख रूप से जुड़ी होती हैं।
मान्यता है कि महिषासुर रूपी राक्षस से बचने के लिए मां नंदा-सुनंदा कदली वृक्षों में जाकर छिप गई थीं। इसी मान्यता के चलते मां की प्रतिमाओं के निर्माण के लिए कदली वृक्ष का प्रयोग किया जाता है। कदली वृक्ष से देवी का स्वरूप तैयार करना मानव और प्रकृति के अटूट संबंध तथा उत्तराखंडवासियों की मां नंदा के प्रति गहरी श्रद्धा को दर्शाता है।

नौ दिनों तक होंगे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन
कूर्मांचल परिषद गढ़ी शाखा की ओर से नंदा-सुनंदा महोत्सव को भव्य और दिव्य रूप देने की तैयारियां की गई हैं। नौ दिनों तक मंदिर में मां नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना और विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
कार्यक्रम में कूर्मांचल परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार, गढ़ी कैंट शाखा अध्यक्ष राजेश पंत, शाखा सचिव एवं कार्यक्रम संयोजक बबीता साह लोहानी, प्रेमा तिवारी, गणेश कांडपाल, धर्मपुर शाखा सांस्कृतिक सचिव सुंदर आगरी, वंदना बिष्ट, पवन डबराल, हरीश चंद पांडे, रमा कांडपाल, कमला उप्रेती, पुष्पा, सविता, गीता तिवारी, पुष्पा मेहरा, कल्पना वर्मा, रेनू बिष्ट, वरिष्ठ समाजसेवी जोगेंद्र पुंडीर, तारा, तनुजा तिवारी, अन्नू, पार्षद कौलागढ़ देवकी नौटियाल, लीला बिष्ट, दुर्गा सिंह कन्याल, कमला पांडेय, गिरीश चंद जोशी, सीमा जोशी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं आयोजक मौजूद रहे।
