‘ऊंट के मुंह में जीरा’ कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत ने आपदा प्रभावितों को दी जाने वाली धनराशि को बढ़ाने की मांग की.
पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत ने आपदा प्रभावितों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली धनराशि को ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ के समान बताया. उन्होंने सरकार के आपदा प्रबंधन तंत्र को पूरी तरह से विफल बताते हुए कहा कि प्रदेश में लगातार भीषण वर्षा, बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं घट रही हैं. जिस कारण पूरा प्रदेश अस्त व्यस्त हो गया है.

हरक सिंह रावत का कहना है कि देश में उत्तराखंड पहला राज्य है जहां गठन के समय ही आपदा प्रबंधन मंत्रालय बनाया गया. लेकिन आज भी कोई प्रभावी तंत्र प्रदेश में खड़ा नहीं हो पाया है. वर्तमान में आपदा बजट 1012 करोड़ रुपए रखा गया है, जो नाकाफी है. उन्होंने कम से कम आपदा बजट ढाई हजार करोड़ रुपये किए जाने की मांग उठाई, ताकि सरकार प्रभावितों के आंसू पोंछ सके.
उन्होंने कहा कि हाल ही में उत्तराखंड के धराली गांव में आई आपदा पर पीड़ित परिवारों को सरकार की ओर से राहत के रूप में जो धनराशि दी जा रही है, वह ‘भीख’ के समान है. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में लगातार आपदाएं घटती रहती हैं. किंतु इन आपदाओं से प्रभावित हुए लोगों को सरकार की तरफ से बहुत कम सहायता राशि दी जा रही है. आपदा पीड़ितों को इतनी कम धनराशि देना, नहीं देने के बराबर है. हालांकि आर्थिक सहायता देकर भले ही आपदा प्रभावित परिवारों के दुख को कम तो नहीं किया जा सकता है, लेकिन कम से कम उनको उचित आपदा राहत देकर उनके आंसू तो पोंछे जा सकते हैं. इसके अलावा आपदा से कम से कम नुकसान हो, उसको लेकर भी सरकार को इस दिशा में काम करने होंगे.
आपदा प्रबंधन 100 प्रतिशत केंद्र पोषित योजना होनी चाहिए: हरक सिंह का कहना है कि यूपीए सरकार के समय आपदा प्रबंधन शत प्रतिशत केंद्र सरकार की योजना हुआ करती थी. लेकिन हिल स्टेट में 90 प्रतिशत केंद्र और 10 प्रतिशत राज्य पोषित योजना हो गई है. उन्होंने मांग उठाई कि पहले की तरह आपदा प्रबंधन 100 प्रतिशत केंद्र पोषित योजना होनी चाहिए. क्योंकि प्रदेश सरकार के पास आपदा प्रबंधन के इतने संसाधन मौजूद नहीं हैं.
25 लाख धनराशि देने की मांग: हरक सिंह ने कहा कि सीएम के पास पहले से ही कई विभाग हैं. ऐसे में आपदा प्रबंधन का जिम्मा किसी अन्य मंत्री को दिया जाना चाहिए. विभाग उपनल और आउटसोर्सिंग कर्मियों के बलबूते पर चल रहा है. ऐसे में तहसील स्तर पर आपदा प्रबंधन का ढांचा तैयार होना चाहिए और सरकार को किसी जिम्मेदार अधिकारी को आपदा प्रबंधन का दायित्व सौंपना चाहिए. इसके अलावा आपदा में अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो महंगाई के जमाने में सिर्फ चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जा रही है, जो कि कम से कम धनराशि बढ़ाकर 25 लाख रुपए होनी चाहिए.
आपदा पीड़ितों को दी जाने वाली धनराशि काफी कम: उन्होंने आरोप लगाया कि धराली में जिनके घर, दुकान बह गए हैं, उन आपदा पीड़ितों को दी जाने वाली धनराशि भी काफी कम है. घायलों को 2 लाख की सहायता राशि भी नाकाफी है. 40 से 60 प्रतिशत दिव्यांग लोगों को 74 हजार दिए जा रहे हैं. दिव्यांग व्यक्ति को उसकी स्थिति के मुताबिक कम से कम 10 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए. उन्होंने केंद्र से दीर्घकालीन आपदा प्रबंधन के लिए विशेष पैकेज की मांग उठाई.

