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उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते जातिगत भेदभाव के बीच UGC का बड़ा कदम: Equity Committee अब अनिवार्य

उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते जातिगत भेदभाव के बीच UGC का बड़ा कदम: Equity Committee अब अनिवार्य

नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए “Equity Committee” के गठन को अनिवार्य कर दिया है। इस समिति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है। UGC का यह निर्णय ऐसे समय आया है जब आधिकारिक आँकड़े कैंपसों में सामाजिक असमानता की गंभीर स्थिति को उजागर कर रहे हैं।

UGC के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 118 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। शिकायतों की संख्या 173 से बढ़कर 378 तक पहुँच गई। आयोग का मानना है कि यह समस्या अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संरचनात्मक (structural) स्वरूप ले चुकी है।

सिर्फ जागरूकता नहीं, अब जवाबदेही पर जोर

अब तक संस्थानों में संवेदनशीलता कार्यशालाएँ, जागरूकता पोस्टर और दिशानिर्देश जैसे “लचीले प्रावधान” लागू थे। लेकिन UGC ने स्वीकार किया है कि ये उपाय भेदभाव कम करने में पर्याप्त साबित नहीं हुए। इसी कारण नए नियमों में स्पष्ट समयसीमा तय की गई है:

शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक

15 दिन के भीतर जाँच रिपोर्ट

रिपोर्ट के बाद 7 दिन के भीतर कार्रवाई

इसे कैंपस प्रशासन की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक सख्त कदम माना जा रहा है।

‘सामान्य वर्ग’ को शामिल न करने पर उठे सवाल

कुछ समूहों द्वारा यह सवाल उठाया गया है कि Equity Committee में “सामान्य वर्ग” को क्यों शामिल नहीं किया गया। विशेषज्ञों का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी को बाहर करने के लिए नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित समूहों के संरक्षण के लिए बनाई गई है। इसकी तुलना महिला उत्पीड़न रोकने के लिए गठित Women Cell से की जा रही है, जो एक विशेष प्रकार के उत्पीड़न से निपटने के लिए लक्षित तंत्र होता है।

‘दुरुपयोग’ की आशंका पर बहस

नियमों को लेकर यह तर्क भी सामने आया है कि इनका दुरुपयोग हो सकता है। हालांकि विधि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कानून के दुरुपयोग की संभावना उसके अस्तित्व को नकारने का आधार नहीं हो सकती। RTI, श्रम कानूनों और महिला सुरक्षा कानूनों में भी दुरुपयोग के उदाहरण रहे हैं, लेकिन इन्हें समाप्त करने की बजाय प्रक्रियात्मक संतुलन से लागू किया जाता है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि UGC ने अंतिम नियमों में “फर्जी शिकायत” से जुड़ा सख्त प्रावधान हटाया है, ताकि पीड़ित शिकायत दर्ज कराने से न हिचकें।

संरचनात्मक असमानता से निपटने की कोशिश

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे को चुनौती देने की कोशिश है जिसमें जातिगत असमानता लंबे समय से सामान्यीकृत रही है। शिक्षा संस्थानों को समान अवसर का स्थल माना जाता है, लेकिन आँकड़े दिखाते हैं कि सामाजिक पृष्ठभूमि अभी भी अनुभवों को प्रभावित करती है।

निष्कर्ष

UGC की Equity Committee व्यवस्था को कैंपसों में “समावेशी वातावरण” सुनिश्चित करने की दिशा में एक संस्थागत कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि समानता अब केवल वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी जवाबदेही का विषय बनती जा रही है।

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