डायबिटिक रेटिनोपैथी से होने वाला विज़न लॉस रोका जा सकता है, शुरुआती जांच है सबसे ज़रूरी: विशेषज्ञ
डायबिटिक रेटिनोपैथी से होने वाले विज़न लॉस को रोका जा सकता है, शुरुआती पहचान बेहद ज़रूरी:
डॉ. बी.एम. विनोद कुमार एवं डॉ. सोनल बंगवाल
देहरादून | 31 जनवरी 2026


देशभर में डायबिटीज के मामलों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के साथ डायबिटिक रेटिनोपैथी (DR) आज रोकी जा सकने वाली अंधेपन की एक प्रमुख वजह बनती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते पहचान और नियमित नेत्र जांच से इस गंभीर समस्या से होने वाले स्थायी दृष्टि नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

इस विषय पर जानकारी देते हुए कंसलटेंट ओफ्थल्मोलॉजिस्ट डॉ. बी.एम. विनोद कुमार ने बताया कि डायबिटिक रेटिनोपैथी लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर लेवल के कारण होने वाली एक माइक्रोवैस्कुलर जटिलता है, जिसमें आंख की रेटिना की रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि बीमारी के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, जिसके कारण मरीज़ देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। आगे चलकर इसके लक्षणों में धुंधली दृष्टि, आंखों के सामने तैरते धब्बे (फ्लोटर्स), दृष्टि का विकृत होना या अचानक नजर कम होना शामिल हो सकता है।
डॉ. विनोद कुमार ने बताया कि जिन मरीजों को लंबे समय से डायबिटीज है, जिनका ब्लड शुगर नियंत्रित नहीं रहता या जो उच्च रक्तचाप व अन्य मेटाबॉलिक रोगों से पीड़ित हैं, उनमें डायबिटिक आंखों की बीमारियों का खतरा अधिक होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डायबिटीज से पीड़ित हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार आंखों की संपूर्ण जांच अवश्य करानी चाहिए, भले ही कोई लक्षण मौजूद न हों।
उन्होंने यह भी बताया कि फंडस इमेजिंग और OCT जैसी आधुनिक जांच तकनीकों के साथ-साथ लेज़र थेरेपी, इंट्राविट्रियल एंटी-VEGF इंजेक्शन और विट्रियोरेटिनल सर्जरी जैसी आधुनिक उपचार विधियों ने शुरुआती चरण में पहचानी गई डायबिटिक रेटिनोपैथी के इलाज को कहीं अधिक प्रभावी बना दिया है।
इस विषय पर आगे जानकारी देते हुए कंसलटेंट ओफ्थल्मोलॉजिस्ट डॉ. सोनल बंगवाल ने बताया कि डायबिटिक मरीजों में मोतियाबिंद की सर्जरी समय पर कराए जाने से दृष्टि परिणाम बेहतर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती चरण में की गई मोतियाबिंद सर्जरी न केवल पैनरेटिनल फोटोकोगुलेशन (PRP) को अधिक प्रभावी बनाती है, बल्कि डायबिटिक मैकुलर एडिमा (DME) की समय रहते पहचान, जांच और उपचार को भी संभव बनाती है।
डॉ. सोनल बंगवाल ने बताया कि लेंस की अपारदर्शिता बढ़ने से पहले मोतियाबिंद की सर्जरी कराने पर रेटिना और मैकुला का सटीक मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे सर्जरी के बाद होने वाली मैकुलर सूजन के जोखिम में कमी आती है और मरीजों को बेहतर दृष्टि लाभ मिलता है।
दोनों विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि डायबिटीज का समग्र प्रबंधन, मरीजों को सही जानकारी देना और फिज़िशियन एवं नेत्र विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय बेहद आवश्यक है, ताकि समय पर रेफरल हो सके और आंखों से जुड़ी जटिलताओं को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके।
उन्होंने कहा कि जल्दी जांच, ब्लड शुगर का सख्त नियंत्रण और समय पर नेत्र उपचार ही डायबिटिक रेटिनोपैथी से होने वाली दृष्टिहीनता को रोकने का सबसे कारगर तरीका है।
