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RTI एक्टिविस्ट विकेश नेगी का बड़ा खुलासा : ‘पर्यावरण संरक्षण’ की आड़ में साल के जंगल पर कब्जा, पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी सहित अन्य को 2011 में दिए गये पट्टे रद्द करने की मांग

एसडीएम विकासनगर व राज्य सरकार पर गलत आवंटन का आरोप
RTI एक्टिविस्ट एडवोकेट विकेश नेगी जाएंगे सुप्रीम कोर्ट


देहरादून, 24 जनवरी।
उत्तराखंड में वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने आरोप लगाया है कि 94.9060 हेक्टेयर (लगभग 1138.872 बीघा) साल जंगल/वन भूमि को एसडीएम विकासनगर एवं राज्य सरकार द्वारा गलत तरीके से पट्टों के रूप में आवंटित किया गया।

एडवोकेट नेगी ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्य सचिव उत्तराखंड, राजस्व सचिव और जिलाधिकारी देहरादून से करते हुए इसे संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन बताया है।

पद्मश्री डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नाम आवंटन का आरोप

इस प्रकरण में सबसे चर्चित नाम पद्मश्री व पद्मभूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का सामने आया है। आरोप है कि वर्ष 2011 में देहरादून के ईस्ट होप टाउन क्षेत्र स्थित “साल जंगल” (वन भूमि) को उनके नाम पर आवंटित किया गया, जिस पर वर्तमान में HESCO NGO का पक्का भवन निर्मित है।
एडवोकेट नेगी ने इस निर्माण को अवैध बताते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण की आड़ में वन भूमि के दुरुपयोग का मामला करार दिया है।

मुख्य सचिव से डीएम तक भेजा गया विस्तृत प्रतिवेदन

नेगी द्वारा भेजे गए प्रतिवेदन में खाता संख्या 02493, खसरा संख्या 384/1, कुल क्षेत्रफल 0.1170 हेक्टेयर तथा राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि “साल जंगल/वन भूमि” का हवाला दिया गया है।
प्रतिवेदन में मांग की गई है कि—

वर्ष 2011 में किया गया पट्टा/आवंटन तत्काल निरस्त किया जाए

अवैध निर्माण को ध्वस्त किया जाए

जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय व आपराधिक कार्रवाई हो

1946 के बाद वन भूमि पर पट्टा अवैध : सुप्रीम कोर्ट

एडवोकेट नेगी ने सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि 8 अगस्त 1946 के बाद किसी भी वन भूमि पर पट्टा देना अवैध है।
इस तिथि के बाद जंगल, वन, झाड़ी, नदी, नाला जैसी श्रेणी की भूमि पर दिया गया हर पट्टा Void ab initio (प्रारंभ से ही शून्य) माना जाता है।

UPZA & LR Act की धारा 132 का उल्लंघन

प्रतिवेदन में उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 132 का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत वन, जंगल, झाड़ी, नदी, नाला, तालाब व चारागाह भूमि पर न तो पट्टा दिया जा सकता है और न ही निजीकरण संभव है।
ऐसी भूमि सदैव राज्य या वन विभाग में निहित रहती है।

वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत केंद्र की अनुमति जरूरी

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 के अनुसार किसी भी वन भूमि का गैर-वन उपयोग केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।
प्रतिवेदन में कहा गया है कि भूमि उपयोग परिवर्तन या निर्माण से संबंधित किसी भी केंद्रीय स्वीकृति का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

गोदावर्मन केस और 2025 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का हवाला

टी.एन. गोदावर्मन बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि “जंगल” या “साल जंगल” दर्ज है, तो वह स्वतः वन मानी जाएगी।
साथ ही 15 मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट आदेश में सभी राज्यों को वन भूमि को वन विभाग को हस्तांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं।

पर्यावरणविद् के नाम पर जंगल कटान पर सवाल

एडवोकेट नेगी ने इसे गंभीर विरोधाभास बताते हुए कहा कि जिस व्यक्ति को पर्यावरणविद् के रूप में जाना जाता है, उसी के नाम पर साल जंगल पर भवन निर्माण होना कई सवाल खड़े करता है।

तीन बड़ी मांगें

एडवोकेट विकेश नेगी ने प्रशासन से—

सभी अवैध पट्टों को तत्काल निरस्त करने

HESCO NGO भवन को ध्वस्त कर भूमि को मूल स्वरूप में बहाल करने

दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई
की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी

नेगी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो वे इस पूरे मामले को उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
उन्होंने कहा कि देहरादून में वन व आरक्षित वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हो रहे हैं, जिससे दून घाटी की आबो-हवा और पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

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