Uttrakhand

चुनाव करीब आते ही सीमांत जिलों की याद आई भाजपा सरकार को: गरिमा दसौनी

देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सीमांत जिलों में प्रस्तावित कैबिनेट बैठक को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है।

उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्र किसी भी सरकार के लिए महज दौरे या फोटो-ऑप का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पलायन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

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दसौनी ने आरोप लगाया कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार सीमांत क्षेत्रों में कैबिनेट बैठक आयोजित करने की तैयारी कर रही है, लेकिन इन इलाकों की जमीनी समस्याओं पर अब तक अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, पलायन, सड़क और रोजगार जैसी समस्याएं सामने आती रहीं, तब सरकार की प्राथमिकता क्या थी?

‘कैबिनेट बैठक से नहीं, जमीन पर काम से मजबूत होगा सीमांत’

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि किसी सीमांत जिले में कैबिनेट बैठक आयोजित करने मात्र से सीमांत क्षेत्र मजबूत नहीं होता। उनके मुताबिक, सीमांत तब मजबूत होगा जब स्थानीय युवाओं को रोजगार और आजीविका के अवसर मिलें, मरीजों को इलाज के लिए दूर जिला मुख्यालयों का रुख न करना पड़े और गांव सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़े हों।

उन्होंने सरकार से कैबिनेट बैठक से पहले पिछले वर्षों में सीमांत क्षेत्रों के लिए की गई घोषणाओं की स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की।

दसौनी ने सरकार से पूछा कि—

  • सीमांत क्षेत्रों से जुड़ी पिछली कैबिनेट घोषणाओं में कितनी जमीन पर उतरीं?
  • पलायन रोकने और स्थानीय रोजगार बढ़ाने के प्रयासों के क्या परिणाम रहे?
  • कितने सीमांत गांव अभी भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और मोबाइल कनेक्टिविटी जैसी सुविधाओं से वंचित हैं?
  • युवाओं के लिए घोषित योजनाओं से कितने लोगों को वास्तविक रोजगार या आजीविका मिली?
  • प्रस्तावित कैबिनेट बैठक के बाद लिए जाने वाले फैसलों की समयबद्ध कार्ययोजना और प्रगति रिपोर्ट क्या सार्वजनिक की जाएगी?

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी सरकार से मांगा जवाब

गरिमा दसौनी ने जनवरी 2026 में राज्य सरकार और आईटीबीपी के बीच ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ के तहत पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के 108 सीमांत गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए हुए समझौते का हवाला देते हुए इसकी मौजूदा स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की।

उन्होंने पूछा कि अभियान के तहत अब तक कितने गांवों तक वास्तविक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंची हैं और इसका जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा है।

‘सीमांत सुरक्षा और विकास दोनों का सवाल’

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि सीमांत गांवों को मजबूत करना केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि यदि सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार और संचार की कमी के कारण सीमांत क्षेत्रों से आबादी का पलायन जारी रहता है, तो सरकार को इन मूल समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार कैबिनेट बैठक से पहले सीमांत क्षेत्रों में जन-सुनवाई करे और बैठक में लिए गए फैसलों के बाद प्रत्येक जिले के लिए समयसीमा तय करते हुए एक्शन रिपोर्ट सार्वजनिक करे।

दसौनी ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों के लोगों को केवल घोषणाओं के बजाय उनके धरातलीय परिणाम चाहिए। उन्होंने सरकार से यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि सीमांत जिलों में प्रस्तावित कैबिनेट बैठक का फोकस प्रशासनिक और विकासात्मक फैसलों पर है या आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों पर।

उन्होंने अपने बयान के अंत में कहा, “चुनाव आते ही सीमांत याद आ गया, लेकिन सीमांत के लोग पूछ रहे हैं—साढ़े नौ साल कहां थे?”

हालांकि, राज्य सरकार की ओर से सीमांत क्षेत्रों की सामरिक महत्ता, सड़क नेटवर्क, पलायन रोकने और स्थानीय रोजगार से जुड़े विभिन्न प्रयासों पर समय-समय पर घोषणाएं और योजनाएं सामने आती रही हैं। जून 2026 में मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों की सामरिक एवं रणनीतिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए सड़क नेटवर्क मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया था, जबकि अगस्त में पलायन निवारण आयोग की बैठक में पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार और स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने पर चर्चा हुई थी।

वहीं, 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र चंपावत के बनबसा में कैबिनेट बैठक प्रस्तावित होने की रिपोर्ट सामने आई है।